देहरादून। कांग्रेस ने उत्तराखंड विधानसभा चुनाव की तैयारियों को धार देने के लिए संगठनात्मक ढांचे में बड़े और निर्णायक बदलाव का फैसला किया है। पार्टी ने सभी 27 संगठनात्मक जिलाध्यक्षों को विधायक टिकट चयन प्रक्रिया में ‘वीटो पावर’ देने का निर्णय लिया है। अब किसी भी विधानसभा सीट पर प्रत्याशी को अंतिम रूप देने से पहले संबंधित जिलाध्यक्ष की सहमति अनिवार्य होगी।
यह अहम फैसला कुरुक्षेत्र में आयोजित संगठन सृजन प्रशिक्षण शिविर में लिया गया। पार्टी सूत्रों के अनुसार, शिविर में यह भी तय हुआ कि भविष्य में उत्तराखंड का प्रदेश अध्यक्ष इन्हीं जिलाध्यक्षों में से चुना जाएगा, जो संगठन और चुनावी प्रदर्शन के आधार पर सबसे प्रभावी साबित होंगे। इससे जिलाध्यक्षों की भूमिका संगठन संचालन तक सीमित न रहकर सीधे सत्ता की रणनीति से जुड़ जाएगी।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कहा कि कुरुक्षेत्र में मिले प्रशिक्षण से संगठन को नई मजबूती मिलेगी। जिलाध्यक्षों के अधिकार बढ़ाए जाएंगे, लेकिन साथ ही उन्हें उनकी जिम्मेदारियों का भी बोध कराया जाएगा, ताकि बूथ से लेकर प्रदेश स्तर तक मजबूत कैडर तैयार किया जा सके।
शिविर में राहुल गांधी ने संगठन को लेकर स्पष्ट संदेश दिया—संगठन व्यक्ति से ऊपर है, जमीन पर काम करने वालों को आगे बढ़ाया जाएगा, निष्क्रिय जिलाध्यक्ष हटेंगे और प्रदर्शन के आधार पर प्रमोशन होगा। उन्होंने टिकट वितरण में स्थानीय संगठन की निर्णायक भूमिका, पैराशूट उम्मीदवारों पर रोक और कैडर बेस को मजबूत करने पर जोर दिया।
कुरुक्षेत्र में उत्तराखंड और हरियाणा के जिलाध्यक्षों को संगठन निर्माण, बूथ मैनेजमेंट और चुनावी रणनीति की ट्रेनिंग दी गई। 20 जनवरी को शिविर में पहुंचे राहुल गांधी ने उत्तराखंड के 26 जिलाध्यक्षों से सीधे संवाद कर उनमें जोश भरा।
नैनीताल के जिलाध्यक्ष राहुल छिमवाल के अनुसार, राष्ट्रीय अध्यक्ष सचिन राव ने स्पष्ट किया कि अब टिकट वितरण में नेता प्रतिपक्ष, प्रदेश अध्यक्ष, प्रदेश प्रभारी और संबंधित जिलाध्यक्ष की संयुक्त सहमति आवश्यक होगी। हल्द्वानी महानगर अध्यक्ष गोविंद सिंह बिष्ट ने बताया कि यदि जिलाध्यक्ष असहमत होंगे तो टिकट पर पुनर्विचार किया जाएगा।



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