करोड़ों के राहत कोष पर सवाल, कई विभाग अब तक नहीं दे पाए खर्च का लेखा-जोखा

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उत्तराखंड में मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) की ओर से विभिन्न विभागों को बार-बार पत्र लिखकर पांच साल पुराने खर्चों का हिसाब मांगा जा रहा है। मामला मुख्य रूप से मुख्यमंत्री राहत कोष से कोविड-19 महामारी के दौरान जारी की गई करोड़ों रुपये की धनराशि और उसके उपयोगिता प्रमाण पत्र (यूसी) से जुड़ा है।

सूत्रों के अनुसार, महामारी के समय अलग-अलग विभागों को राहत कार्यों के लिए बड़ी धनराशि जारी की गई थी, जिसमें यात्रियों की घर वापसी, वैक्सीनेशन अभियान, अस्थायी अस्पतालों की स्थापना और जरूरतमंदों की सहायता जैसे कार्य शामिल थे। लेकिन पांच साल बीत जाने के बाद भी कई विभाग अब तक इस खर्च का पूरा लेखा-जोखा शासन को नहीं सौंप पाए हैं।

मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से लगातार रिमाइंडर भेजे जा रहे हैं, लेकिन कई विभागों की ओर से उपयोगिता प्रमाण पत्र जमा नहीं किए गए हैं। इससे मुख्यमंत्री राहत कोष के अंतिम ऑडिट और वित्तीय मिलान में दिक्कतें आ रही हैं।

सबसे बड़ा मामला परिवहन विभाग से जुड़ा बताया जा रहा है। कोविड काल में फंसे यात्रियों और तीर्थयात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने के लिए लगभग 24 करोड़ रुपये जारी किए गए थे। हालांकि इस राशि के खर्च का यूसी अभी तक शासन को उपलब्ध नहीं कराया गया है।

इसी तरह स्वास्थ्य विभाग को भी कई बार पत्र भेजे गए हैं। कोविड काल में 18 से 44 वर्ष आयु वर्ग के निशुल्क वैक्सीनेशन अभियान और अस्थायी कोविड अस्पतालों के संचालन के लिए करीब 130 करोड़ रुपये जारी किए गए थे। इसमें से कुछ राशि वापस कर दी गई और कुछ का यूसी जमा हुआ है, लेकिन लगभग 50 करोड़ रुपये के खर्च का पूरा विवरण अब भी लंबित है।

इसके अलावा न्याय विभाग को भी मुख्यमंत्री राहत कोष से करीब 60 लाख रुपये अधिवक्ताओं की सहायता के लिए जारी किए गए थे, लेकिन इसका उपयोगिता प्रमाण पत्र भी अब तक शासन को नहीं मिला है।

वित्तीय नियमों के अनुसार, किसी भी विभाग को आवंटित राशि का उपयोग प्रमाणित करने के लिए यूसी जमा करना अनिवार्य होता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सरकारी धन का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के लिए ही हुआ है। यूसी न मिलने की स्थिति में न केवल ऑडिट प्रक्रिया प्रभावित होती है, बल्कि आगे बजट आवंटन पर भी असर पड़ सकता है।

मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से बार-बार पत्राचार के बावजूद कई विभागों की लापरवाही पर सवाल उठ रहे हैं। यह स्थिति विभागीय वित्तीय अनुशासन और जवाबदेही पर भी गंभीर चिंता पैदा करती है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि वर्षों से लंबित इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई की गई है, क्योंकि अब तक केवल पत्राचार ही सामने आया है, लेकिन किसी ठोस अनुशासनात्मक कदम की स्पष्ट जानकारी नहीं है।

पूरा मामला सरकारी वित्तीय पारदर्शिता और प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़ा करता है, जहां करोड़ों रुपये के सार्वजनिक धन का हिसाब वर्षों बाद भी अधूरा है।