केदारनाथ की पवित्र रूप छड़ को लेकर मचा बवाल, सरकार ने बैठाई जांच

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उत्तराखंड के केदारनाथ धाम से जुड़ी अत्यंत पवित्र धार्मिक वस्तु धर्म दंड (रूप छड़) को लेकर हाल ही में विवाद खड़ा हो गया। यह चांदी का पवित्र दंड भगवान केदारनाथ का प्रतीक माना जाता है और केदारनाथ धाम की धार्मिक परंपराओं में इसका विशेष महत्व है।

मामला तब सामने आया जब बदरी-केदार मंदिर समिति (बीकेटीसी) के भंडार गृह में यह धर्म दंड मौजूद नहीं मिला। इसके बाद प्रशासन और मंदिर प्रबंधन में हलचल मच गई। उत्तराखंड सरकार के धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज ने इस मामले को गंभीर मानते हुए जांच के आदेश दिए और कहा कि केदारनाथ धाम के सभी धार्मिक प्रतीकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी बीकेटीसी की है।

देवभूमि उत्तराखंड के चारधामों में शामिल केदारनाथ धाम सनातन धर्म में विशेष स्थान रखता है। यहां के धार्मिक प्रतीक और पूजा परंपराएं पूरे देश के धार्मिक कर्मकांडों के लिए मार्गदर्शक मानी जाती हैं।

इन्हीं प्रतीकों में से एक धर्म दंड (रूप छड़) है, जो केदारनाथ की चल विग्रह डोली के साथ चलता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, बाबा केदारनाथ के दर्शन और इस धर्म दंड के दर्शन का पुण्य समान माना जाता है। इसलिए इसे भगवान केदारनाथ का ही एक स्वरूप माना जाता है।

जांच के दौरान सामने आया कि केदारनाथ धाम के मुख्य रावल भीमाशंकर लिंग महाराष्ट्र के नांदेड़ में आयोजित एक पट्टा अभिषेक रजत महोत्सव कार्यक्रम में शामिल होने गए थे। उसी कार्यक्रम के लिए धर्म दंड को भी वहां भेजा गया था।

बताया जा रहा है कि इसके लिए बीकेटीसी के सीईओ विजय थपलियाल ने 19 जनवरी 2026 को अनुमति दी थी। हालांकि कई जानकारों का कहना है कि यह एक निजी कार्यक्रम था और धार्मिक प्रतीकों को इस तरह बाहर ले जाने की कोई परंपरा नहीं है।

इस मामले में साल 2000 का एक पुराना पत्र भी सामने आया है, जिसमें रावल द्वारा इसी तरह के धार्मिक प्रतीकों को दक्षिण भारत ले जाने की अनुमति मांगी गई थी। उस समय मंदिर समिति प्रशासन ने यह कहते हुए अनुमति देने से इनकार कर दिया था कि ऐसी कोई परंपरा या नियम नहीं है।

परंपरा के अनुसार, केदारनाथ और बदरीनाथ धाम के कपाट बंद होने के बाद सभी धार्मिक प्रतीकों को बीकेटीसी के खजाने में सुरक्षित रखा जाता है और उन्हें कहीं बाहर ले जाने की अनुमति नहीं होती।

केदारनाथ धाम के पुरोहित प्रवीन तिवारी के अनुसार, धर्म दंड अब वापस उत्तराखंड पहुंच चुका है और सुरक्षित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह चोरी या स्थायी रूप से गायब होने का मामला नहीं है, लेकिन बिना उचित प्रक्रिया के इसे बाहर ले जाना उचित नहीं माना जा सकता।

इस मुद्दे पर कांग्रेस प्रवक्ता गरिमा दसौनी ने भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि चारधामों के धार्मिक प्रतीकों के साथ छेड़छाड़ की कोई परंपरा नहीं है। ऐसे में यह स्पष्ट होना चाहिए कि बीकेटीसी के वरिष्ठ अधिकारियों को ऐसी अनुमति देने का आदेश किसने और क्यों दिया।

वहीं, बीकेटीसी के अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी और अन्य अधिकारियों ने फिलहाल इस पूरे मामले पर चुप्पी साध रखी है, जिससे विवाद और गहरा गया है।